सनातन योग विज्ञान में मानव शरीर को केवल हाड़-मांस और खून का पुतला नहीं माना गया है। हमारे ऋषियों-मुनियों ने हजारों साल पहले ही यह खोज लिया था कि इस भौतिक शरीर के भीतर एक अत्यंत सूक्ष्म और शक्तिशाली ऊर्जा शरीर (Energy Body) भी काम करता है। जिस तरह हमारे भौतिक शरीर में खून को ले जाने के लिए नसें होती हैं, उसी तरह सूक्ष्म शरीर में प्राण ऊर्जा को प्रवाहित करने के लिए 72,000 नाड़ियां होती हैं।
इन नाड़ियों के मार्ग में जहाँ-जहाँ मुख्य ऊर्जा केंद्र आपस में मिलते हैं, वहाँ ऊर्जा के भंवर या चक्र बनते हैं। इन्हें ही योग शास्त्र में '7 चक्र' (Seven Chakras) कहा गया है। ये चक्र रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से से शुरू होकर सिर के शीर्ष भाग तक फैले होते हैं। जब ये चक्र संतुलित और जाग्रत होते हैं, तो इंसान शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से अपनी सर्वोच्च स्थिति में होता है। आइए इन सातों चक्रों, उनके बीज मंत्रों और उनके महत्व को गहराई से समझते हैं।
यह चक्र रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले हिस्से (गुदा और जननांग के बीच) स्थित होता है। यह हमारे शरीर की नींव है।
तत्व और रंग: पृथ्वी तत्व, लाल रंग।
बीज मंत्र: लं (LAM)
महत्व: यह चक्र सुरक्षा, स्थिरता, अस्तित्व और हमारी बुनियादी शारीरिक जरूरतों से जुड़ा है। यदि यह चक्र असंतुलित हो, तो इंसान हर वक्त डर, एंग्जायटी और असुरक्षा की भावना से घिरा रहता है। इसके संतुलित होने पर व्यक्ति निडर, व्यावहारिक और आत्मविश्वास से भरा रहता है।
यह चक्र रीढ़ की हड्डी में नाभि से लगभग दो इंच नीचे स्थित होता है।
तत्व और रंग: जल तत्व, नारंगी (Orange) रंग।
बीज मंत्र: वं (VAM)
महत्व: यह चक्र हमारी रचनात्मकता (Creativity), भावनाओं, इच्छाओं और यौन ऊर्जा का केंद्र है। यदि यह चक्र ब्लॉक हो, तो व्यक्ति जीवन में नीरसता महसूस करता है, उसकी क्रिएटिविटी खत्म हो जाती है और वह डिप्रेशन में आ सकता है। संतुलित होने पर जीवन में आनंद, नया करने की ऊर्जा और सकारात्मकता बनी रहती है।
यह चक्र हमारी नाभि के ठीक पीछे रीढ़ की हड्डी में स्थित होता है।
तत्व और रंग: अग्नि तत्व, पीला रंग।
बीज मंत्र: रं (RAM)
महत्व: यह चक्र हमारी संकल्प शक्ति (Will Power), साहस और आत्म-नियंत्रण का केंद्र है। हमारे शरीर की जठराग्नि (पाचन तंत्र) भी इसी से संचालित होती है। यदि यह चक्र कमजोर हो, तो व्यक्ति डरपोक होता है, निर्णय नहीं ले पाता और पेट की बीमारियों से परेशान रहता है। जाग्रत होने पर व्यक्ति में गजब की नेतृत्व क्षमता और साहस आ जाता है।
यह चक्र हमारी छाती के बीचों-बीच, हृदय के पास स्थित होता है। यह नीचे के तीन भौतिक चक्रों और ऊपर के तीन आध्यात्मिक चक्रों को जोड़ने वाला पुल है।
तत्व और रंग: वायु तत्व, हरा रंग।
बीज मंत्र: यं (YAM)
महत्व: यह चक्र प्रेम, करुणा, क्षमा और दया का केंद्र है। जब अनाहत चक्र जाग्रत होता है, तो साधक हर जीव से निस्वार्थ प्रेम करने लगता है। इसके असंतुलित होने पर व्यक्ति स्वार्थी, ईर्ष्यालु और कठोर दिल का हो जाता है।
यह चक्र हमारे कंठ (गले) के पीछे रीढ़ की हड्डी में स्थित होता है।
तत्व और रंग: आकाश तत्व, हल्का नीला रंग।
बीज मंत्र: हं (HAM)
महत्व: यह चक्र हमारी अभिव्यक्ति (Communication) और वाणी की शक्ति का केंद्र है। जब यह चक्र संतुलित होता है, तो व्यक्ति की वाणी में एक गजब का आकर्षण और तेज आ जाता है, वह जो बोलता है लोग उसे सुनते हैं। असंतुलित होने पर व्यक्ति सच बोलने से डरता है या बहुत ज्यादा कड़वा बोलता है।
यह चक्र दोनों भौहों के बीच (माथे पर) स्थित होता है, जिसे हम 'तीसरी आंख' भी कहते हैं।
तत्व और रंग: मन तत्व, गहरा नीला या जामुनी (Indigo) रंग।
बीज मंत्र: ॐ (OM)
महत्व: यह चक्र हमारी अंतःप्रज्ञा (Intuition), दूरदर्शिता और मानसिक एकाग्रता का केंद्र है। आज्ञा चक्र जाग्रत होने पर साधक को आने वाली घटनाओं का पहले से आभास होने लगता है, उसका सबकॉन्शियस माइंड बहुत शक्तिशाली हो जाता है और वह माया के पार देख पाता है।
यह चक्र हमारे सिर के सबसे ऊपरी हिस्से (चोटी वाले स्थान) पर स्थित होता है। इसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल भी कहा जाता है।
तत्व और रंग: यह सभी तत्वों से परे है, इसका रंग शुद्ध सफेद या चमकीला बैंगनी होता है।
बीज मंत्र: मौन (Silence) या ॐ
महत्व: यह अध्यात्म की आखिरी और सर्वोच्च अवस्था है। जब साधक की प्राण ऊर्जा (कुंडलिनी शक्ति) मूलाधार से उठकर सहस्रार तक पहुँच जाती है, तो उसे 'समाधि' या 'मोक्ष' का अनुभव होता है। यहाँ आकर इंसान ब्रह्मांड की परम चेतना (ईश्वर) के साथ पूरी तरह एक हो जाता है।
चक्रों को जाग्रत करने के लिए किसी जादू की जरूरत नहीं होती, इसके लिए योग में स्पष्ट विधियां बताई गई हैं:
मंत्र ध्यान (Chakra Meditation): रोज़ शांत बैठकर उस चक्र के स्थान पर ध्यान केंद्रित करें और उसके बीज मंत्र का लयबद्ध उच्चारण करें।
प्राणायाम: अनुलोम-विलोम और कपालभाति जैसी क्रियाएं हमारी नाड़ियों को शुद्ध करती हैं, जिससे चक्रों में ऊर्जा का प्रवाह सुगम हो जाता है।
कर्मों में शुद्धता: जब आप प्रेम, करुणा और निस्वार्थ भाव से जीते हैं, तो आपके हृदय और कंठ चक्र अपने आप खिलने लगते हैं।
हमारे शरीर के ये 7 चक्र कोई काल्पनिक धारणा नहीं हैं, बल्कि ये हमारे भीतर छिपे ऊर्जा के असीम महासागर के द्वार हैं। एक आम इंसान अक्सर अपनी पूरी जिंदगी नीचे के केवल दो-तीन चक्रों (भोजन, डर, कामुकता) में ही गुजार देता है। लेकिन जब एक साधक सचेत होकर ध्यान और साधना के जरिए अपनी ऊर्जा को ऊपर की तरफ उठाता है, तो उसका जीवन अद्भुत, आनंदमय और दिव्य बन जाता है। अपने भीतर झांकिए, क्योंकि सारा ब्रह्मांड आपके भीतर ही समाया हुआ है।
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