सनातन परंपरा में 'मंत्र' का स्थान बहुत ऊंचा माना गया है। बचपन से ही हम अपने घरों में माता-पिता या दादा-दादी को सुबह-सुबह गायत्री मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र या 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करते हुए देखते आ रहे हैं। लेकिन आज की पढ़ी-लिखी और तार्किक पीढ़ी के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि— "क्या कुछ शब्दों को बार-बार दोहराने से सच में कोई चमत्कार हो सकता है? या यह सिर्फ एक मानसिक सांत्वना और अंधविश्वास है?"
अगर आप भी ऐसा सोचते हैं, तो आपको यह जानकर हैरानी होगी कि प्राचीन ऋषियों द्वारा खोजा गया मंत्र शास्त्र कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि एक बेहद उन्नत और गहरा ध्वनि विज्ञान (Sound Science) है। आज की आधुनिक साइंस भी इस बात को स्वीकार कर रही है कि इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी है, वह सब ऊर्जा (Energy) है और हर ऊर्जा की अपनी एक वेवलेंथ और वाइब्रेशन (कंपन) होती है।
अगर हम 'मंत्र' शब्द के अर्थ को समझें, तो यह दो धातुओं से मिलकर बना है— "मननाथ त्रायते इति मंत्रः"। यानी, जो मन को मनन करने पर (बार-बार दोहराने पर) 'त्रायते' यानी बंधनों और चिंताओं से मुक्त कर दे, वही मंत्र है।
हमारा मन बहुत चंचल है। इसमें एक सेकंड में हजारों विचार आते-जाते रहते हैं। मंत्र एक ऐसा टूल या औजार है, जो इस भटकते हुए मन को एक जगह पर लाकर बांध देता है। जब मन एकाग्र होता है, तो उसकी बिखरी हुई शक्तियां सिमटने लगती हैं और इंसान के भीतर एक अद्भुत मानसिक बल का जन्म होता है।
ऋषियों-मुनियों ने हजारों साल पहले ध्यान की गहरी अवस्था में यह महसूस किया था कि अक्षरों और शब्दों के उच्चारण से हमारे शरीर और आसपास के वातावरण में खास तरह की तरंगें (Waves) पैदा होती हैं। जब हम किसी मंत्र का विशेष लय और सुर में उच्चारण करते हैं, तो उससे पैदा होने वाला कंपन हमारे शरीर के भीतर के सिस्टम को प्रभावित करता है।
चक्रों का जाग्रत होना: हमारे सूक्ष्म शरीर में 7 मुख्य ऊर्जा केंद्र होते हैं, जिन्हें 'चक्र' कहा जाता है। जब हम किसी मंत्र का जाप करते हैं, तो उसकी ध्वनि तरंगे इन चक्रों से टकराती हैं। उदाहरण के लिए, जब आप 'ॐ' (Om) का उच्चारण करते हैं, तो इसका सीधा असर आपके आज्ञा चक्र (भौहों के बीच) और सहस्रार चक्र (सिर के ऊपर) पर पड़ता है।
मस्तिष्क की तरंगों में बदलाव: न्यूरोसाइंस के अनुसार, जब हमारा मन तनाव में होता है, तो दिमाग में 'बीटा' तरंगें चलती हैं। लेकिन जब कोई साधक पूरी तन्मयता से मंत्र जाप करता है, तो उसका दिमाग शांत होने लगता है और मस्तिष्क 'अल्फा' या 'थिटा' वेव्स की स्थिति में चला जाता है। यह वही स्थिति है जो गहरी नींद या गहरे ध्यान में मिलती है, जिससे मानसिक बीमारियां और तनाव जड़ से खत्म होने लगते हैं।
वातावरण का शुद्धिकरण: ध्वनि तरंगें केवल शरीर के अंदर ही काम नहीं करतीं, बल्कि वे बाहर हवा में भी फैलती हैं। जहां नियमित रूप से मंत्रों का जाप या यज्ञ-हवन होता है, वहां का औरा (Aura) पूरी तरह बदल जाता है। वहां नकारात्मक ऊर्जा टिक नहीं पाती और आने वाले हर व्यक्ति को एक अजीब सी शांति महसूस होती है।
मंत्र विज्ञान में जप करने के तीन तरीके बताए गए हैं, और हर तरीके की अपनी एक अलग महिमा है:
इसमें मंत्र का उच्चारण इतनी आवाज में किया जाता है कि पास बैठा व्यक्ति भी उसे सुन सके। यह शुरुआत करने वाले साधकों के लिए बहुत अच्छा है। जब मन बहुत ज्यादा भटक रहा हो, तो बोलकर जप करने से जीभ और कान दोनों मंत्र में व्यस्त हो जाते हैं, जिससे ध्यान लगाने में आसानी होती है।
इस प्रकार के जप में होंठ और जीभ तो हिलते हैं, लेकिन आवाज बाहर नहीं आती। साधक अपने भीतर ही उस ध्वनि को सुनता है। वाचिक जप की तुलना में उपांशु जप को सौ गुना अधिक प्रभावशाली माना गया है, क्योंकि इसमें ऊर्जा बाहर बिखरने के बजाय अंदर ही इकट्ठा होती है।
यह जप की सबसे श्रेष्ठ और कठिन अवस्था है। इसमें न तो होंठ हिलते हैं और न ही जीभ। साधक पूरी तरह शांत बैठकर केवल अपने मन के भीतर मंत्र का उच्चारण करता है और उसे महसूस करता है। मानसिक जप करने के लिए बहुत ऊंचे स्तर की एकाग्रता की जरूरत होती है। कहते हैं कि लगातार मानसिक जप करने से मंत्र साधक के सबकॉन्शियस माइंड (अवचेतन मन) में बैठ जाता है, और फिर सोते-जागते हर वक्त वह मंत्र अंदर अपने आप चलता रहता है, जिसे 'अजपा जप' कहते हैं।
यदि आप चाहते हैं कि आपके मंत्र जाप का पूरा असर दिखे, तो आपको इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए:
उच्चारण की शुद्धता: मंत्रों में शब्दों का सही उच्चारण बहुत मायने रखता है। गलत उच्चारण से ध्वनि बदल जाती है और उसका असर भी विपरीत या कम हो सकता है। इसलिए यदि मंत्र कठिन हो, तो पहले किसी जानकार से उसका सही उच्चारण सीख लें।
श्रद्धा और विश्वास: बिना भाव के किया गया जप सिर्फ एक शारीरिक कसरत बनकर रह जाता है। आपके मन में उस मंत्र और इष्ट देव के प्रति जितना गहरा प्रेम और विश्वास होगा, मंत्र उतनी ही जल्दी सिद्ध होगा।
नियमितता (Consistency): ऐसा नहीं होना चाहिए कि आज आपने दो घंटे जप किया और फिर चार दिन तक छुआ भी नहीं। रोज भले ही आप 15 मिनट ही बैठें, लेकिन एक निश्चित समय और निश्चित स्थान पर बैठें। इससे वहां एक पॉजिटिव एनर्जी जोन बन जाता है।
मंत्र विज्ञान कोई जादू-टोना नहीं है जिसे रातों-रात अमीर बनने या किसी को नुकसान पहुंचाने के लिए इस्तेमाल किया जाए। यह तो अपनी चेतना को ब्रह्मांड की परम चेतना से जोड़ने का एक बेहद वैज्ञानिक माध्यम है। जब आप पूरे मन से किसी मंत्र को अपने भीतर उतार लेते हैं, तो आपकी वाणी में एक तेज, चेहरे पर एक चमक और मन में कभी न खत्म होने वाला आनंद भर जाता है।
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